भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मुसाफिर रैन रही थोरी / ललित किशोरी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

 
मुसाफिर रैन रही थोरी।
जागु-जागु सुख-नींद त्यागि दै, होत बस्तु की चोरी॥

मंजिल दूरि भूरि भवसागर, मान क्रूर मति मोरी।
ललित किसोरी हाकिम सों डरु, करै जोर बरजोरी॥