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मुहब्बत के कई दिलकश नज़ारे रोज़ आते हैं / विकास

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मुहब्बत के कई दिलकश नज़ारे रोज़ आते हैं
चले आना मेरी छत पर सितारे रोज़ आते हैं

नहीं ईमान बिकते हैं कहा उसने मुझे साहब
मगर ईमान के कपड़े उतारे रोज़ आते हैं

भुलाकर भी नहीं तुमको भुला पाया अभी तक मैं
पुराने ख़त जो खाबों में तुम्हारे रोज़ आते हैं

अगर तुम दूर होते हो तुम्हें ये तो पता होगा
तुम्हारे आइने को हम निहारे रोज़ आते हैं

बढ़ा है कद हमारा आजकल शायद इसी कारण
शहर से गांव तक किस्से हमारे रोज़ आते हैं