भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मेंदी तो आई टोडा देस से / मालवी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

मेंदी तो आई टोडा देस से
केसरिया हो राज
रूपईया री टांक बेचाय
मेंदी म्हारी रंग चुवे हो राज
बाईजी रा बीरा घर नई
मेंदी कौन मोलाय
छोटो देवर लाड़लो, केसरिया हो राज
मेंदी मोलावन जाय
लसर-लसर मेंदी बांटस्यां केसरिया हो राज
झबियां झोला खाय, मेंदी म्हारी रंग चुपे हो राज
देवर की राची चीटी आँग की
भावज का रचिया दोई हाथ
न्हाई धोई सीस गुथावियो
मोतीड़ा से भरली माँग
दो हो जेठानी तमारो हालरो
दो हो देराणी तमारो चीर
पेली पेड़ी पग दियो
कंकू में खरन्या पाँव
दूसरी पेड़ी पग दियो
मेंदी में खरन्या पाँव
तीसरी पेड़ी पग दियो
झबलक दिवलो हाथ
चौथी पेड़ी पग दियो
सिरनी री छाब हाथ
पांचीव पेड़ी पग दियो
पाना री चोली हाथ
मड़मड़ मेड़िया चड़ी गया
जई उबा ढ़ोला रा पास
जागता था पण सोई गया
मुख पर राल्यो रूमाल
अंगूठो मोड़ जगा दिया
जागो-जागो हो नणंद बई का बीर
आज का दिन गोरी पीछा फिरो
सिर चढ़ियो मथवार
ऐसी म्हारा मनड़ा में जाणती
लई आती सतवा सोंठ
घसी लाती चरका लौंग
मड़मड़ मेड़ियां ऊतरिया
जई ऊबा राम आँगण बीच
लो हो जेठाणी तमारो हालरो
लो हो देराणी तमारो चीर
लो हो सासूजी तमारा पूत खे
खोला में लई ने धवाड़ो
तमारो दूद लजायो
लो हो बईजी तमारा बीर खे
गेंदा दई समजावो
एक दमड़ी का भुंगड़ा मंगाऊँ
अली-गली में चबावो
पटसाल पालणो बंधारन्यां
तले बिछाऊँ म्हारी चीर
आते-जाते झूला दऊँ
तम झूलो हो नणंद बई का बीर।