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मेरा आज / मोहन अम्बर

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कल तो राह नहीं मिल पाई आज सत्य के द्वार आ गया।
कल इस जग की हाट-गली के छल ने मुझको बहुत डराया,
मंदिर वाली मूरत ने भी उस अवसर का लाभ उठाया,
लेकिन जब से पढ़ली मैंने संघर्षों की विजय कहानी,
तब से सब वैराग्य मर गया और मुझे संसार भा गया,
कल तो राह नहीं मिल पाई आज सत्य के द्वार आ गया।
मन का मैल बहुत धोया पर फिर भी दाग नहीं मिट पाये,
उन दागों ने मेरे सपने गली-गली घर घर भटकाये,
लेकिन जब से समझ गया हूँ स्वार्थ निगोड़े की शैतानी,
तब से राग द्वेष के घर में पावन भावन प्यार छा गया,
कल तो राह नहीं मिल पाई आज सत्य के द्वार आ गया,
ज्ञान ध्यान की खातिर मैंने बदले अपने बहुत बसेरे,
आज यहाँ कल वहाँ लगाये इस जीवन के तम्बू-डेरे,
लेकिन जब से करली मैंने गीत बटोही की अगवानी,
तब से सधे सितार कह रहे मैं अनगूँजा तार गा गया,
कल तो राह नहीं मिल पाई आज सत्य के द्वार आ गया।