भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मेरी तरफ़ से कुछ तो तिरे दिल में चोर है / रंगीन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मेरी तरफ़ से कुछ तो तिरे दिल में चोर है ।
मैंने समझ लिया तो दो-गाना घनोर है ।

इतना बड़ा है मूँह इक आतों की नाक पर,
जितनी बड़ी ददा मेरी उँगली की पोर है ।

रोए ज़रा जो दादा तो दाई हो बे-क़रार,
दाई है मोरनी तो मिरा दादा मोर है ।

मुँह ढाँप कर न रो ये छिलौरी नहीं मुई,
ऐ कूका तेरी उँगली की पक्की ये पोर है ।

ऐसी गले में जाली की करती है दाई के,
जैसी बुरी पड़ी मिरी मियानी की तोर है ।

है मेरा चलना-फिरना दो-गाना के इख़्तियार,
ये जान लो कि मैं हूँ चकई वो डोर है ।

सदक़े ज़नाख़ी मेरे मैं कुर्बान उस की हूँ,
हम में चकई एक है और एक डोर है ।

शायद कि तिरा हो गया मीठा बरस शुरू,
कूका कुछ इन दिनों तिरी चाहत का शोर है ।

तेरी क़सम गँवारी उसे जानती हूँ मैं,
लौण्डी को ’रंगी’ जो कोई कहती बन्दूर है ।