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मेरी नसों में बह रहा है शहर / रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति

मेरी नसों में बह रहा है शहर
लाल रंग का शेड लिए हुए शाम का परदा
दुनिया का हर शहर उसी पर चमक रहा है
जैसै दुनिया का सबसे बड़ा परदा है लाल
और सब कुछ संरिक्षत किए जाने के लिए
मेरे रक्त में डूबी है धरती

धरती लाखों घटनाओ की श्रृंखला है
जो मेरे रक्त में अनंत अणुओं की तरह बहती
समय के नये आयाम की ओर जाती हुई

मेरे शरीर में हज़ारों बरसों का प्रकाश घुला है
जिसमें धरती चमक रही है
मेरा शहर भी चमक रहा है