भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

मेरी ब्रह्म स्याम बनि आयो जी! / स्वामी सनातनदेव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ध्वनि, व्रज के लोक-गीत, कहरवा 17.7.1974

मेरो ब्रह्म स्याम बनि आयो जी! मेरो ब्रह्म
अलख लखन की लगन लगी जब अलख सुलख ह्वै आयो जी!॥
जो कुछ दिखत न रहत एक पल, तासों उर उकतायो।
खोज भई जब अनदेखे की वही एक सत पायो जी॥1॥
जो दीखत परतन्त्र लख्यो जब, देखनहार लखायो।
वही नित्य जीवन जब जान्यों तब सत् ही चित् पायो जी॥2॥
है वियोग ही दुःख-देखि यह दृश्य दुःखमय पायो।
द्रष्टा को न वियोग होत-यह जानि वही सुख ध्यायो जी॥3॥
या विधि सत् चित् सुख ही हमने परम तत्त्व लखि पायो।
परमतत्त्व ही सकल तत्त्व है, ताने यही जनायो जी॥4॥
सकल तत्त्व ही स्याम-मनोहर, अकल सकल ह्वै आयो।
अकल-सकलसों पृथक, स्याम ही उभयरूप दरसायो जी!॥5॥
जो सबको सब कुछ हूँ स्रुतिने सबसों पृथक् बतायो।
वही ब्रह्म मेरो मनमोहन सुन्दर स्याम सुहायो जी!॥6॥