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मेरी माटी ! तुझे पाऊँ / भरत प्रसाद

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तुम्हारे इतने पास रहकर
और पास आने की अकथ बेचैनी के बावजूद
कितना दूर रह जाता हूँ तुमसे ?
बचपन से आज तक तुम्हारे सिवा
किससे इतना नाता रहा ?

परन्तु कैसे झूठ बोलूँ कि
मैं सिर्फ तुम्हारे लिए जीता हूँ ।
तुम्हें इतना ज़्यादा जानने-पहचानने के बावजूद
अभी कहाँ समझ पाया हूँ ?

तुम्हें चाहने को लेकर भी अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं होता,
तुम हमारी माँ जैसी माँओं की माँ हो, मिट्टी !
परन्तु तुम्हें उतनी ज़्यादा माँ कहाँ मान पाया हूँ ?

अन्न के गर्व से फ़सलों के झुक जाने का रहस्य तुम्हीं तो हो,
गमकते हुए फूलों में प्रतिदिन हज़ारों रंग कौन भरता है ?
करोड़ों सालों से कौन दे रहा है,
धरती को अनमोल हरियाली की सौगात ?

पेड़-पौधे तुम्हारे लाख-लाख कृतज्ञ हैं,
अपने वजूद के लिए,
हे प्राणदायिनी ! तुमने इतनी ममता कहाँ से पाई है ?

तुम्हारे भीतर छिपा है जड़-चेतना के उत्थान-पतन का इतिहास
तुम्हारे मौन में क़ैद है मानव-सृष्टि की महागाथा
तुम हो, तो पृथ्वी लाख कठिनाइयों के बावजूद,
लाखों वर्षों से अपने कोने-कोने में ज़िन्दा है ।

बदरंग, बेस्वाद, बेजुबान
माटी ! देखने में तुम कितनी मामूली
पर जीवन के लिए कितनी अनिवार्य
तुम्हें देखकर बार-बार भ्रम होता है
कि छोटा होना क्या वाकई छोटा होना है ?
नीचे रहने का अर्थ क्या सचमुच नीचे रहना है ?

तुम्हारा न हो पाने की विकट पीड़ा में
बेहतर छटपटाता रहता है हृदय
तुम्हारे बग़ैर निरर्थक होते जाने की तड़प
मैं किससे कहूँ ?

जीवन बीतते जाने का मुझे उतना ग़म नहीं
जितना कि अपनी स्वार्थपरता वश
तुम्हें हर पल खोते जाने का है ।
कूड़ा-करकट से भरा हुआ शरीर
एक न एक दिन तुम्हीं में विलीन हो जाएगा—
पता है मुझे

किन्तु तुम्हारे आगे कभी
निःशेष कृतज्ञता के साथ नतमस्तक नहीं हो पाया
रात-दिन यही शिकायत रहती है ख़ुद से ।

(अक्टूबर-2010)