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मेरे क़रीब ना आओ के मैं शराबी हूँ / सबा सीकरी

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मेरे क़रीब ना आओ के मैं शराबी हूँ
मेरा शऊर[1] जगाओ के मैं शराबी हूँ

ज़माने भर की निगाहों से गिर चुका हूँ मैं
नज़र से तुम ना गिराओ के मैं शराबी हूँ

ये अर्ज़ करता हूँ गिर के ख़ुलूस[2] वालो से
उठा सको तो उठाओ के मैं शराबी हूँ

तुम्हारी आँख से भर लूँ सुरूर[3] आँखों में
नज़र नज़र से मिलाओ के मैं शराबी हूँ

शब्दार्थ
  1. सभ्यता, शिष्टाचार
  2. निष्कपटता, निश्छलता, सच्चाई
  3. हल्का नशा, हर्ष, आनन्द