प्रभु! संध्या की उत्ताल जलधि में
गिरि भार बना मेरा प्राण तिनका
मन के हिलाये अब नहीं हिलता
ऐसे में तु्म क्या करोगे ,सुनकर
मेरे मरु जीवन की तप्त कथा
सचमुच चाहते तुम, मेरा भला
तो मुझे यह वर दो कि
मेरे दुख की गहन अंधतम
निशा का कभी न हो भोर
कभी न खिले मेरे हृदय की
मुरझाई कलियाँ, कभी न
वषंत के लिये अधीर हो
मैं नहीं चाहती, मेरे जीवन तट पर
तुम्हारी करुणा से सिंचित होकर
एक भी वटवृक्ष की छाँव हो
जो मनुज का उपहास उड़ाने
जगति की दुख-विपदा को लेकर
नित आकाश की ओर चढ़ता हो