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मेरे हमकदम / कविता भट्ट

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डिबिया में रखी फूल-वेणी कुछ याद दिलाती है;
जो मिलन के क्षणों में केशों में मेरे लगाई थी तुमने।

अब भी महकती है उसी शिद्दत से, लहराती है-
घुँघराली एक लट- जो चेहरे से हटाई थी तुमने।

आज भी वही माला मेरे गले से लग मुस्काती है;
मुझे बड़े प्यार से निहारते हुए; पहनाई थी तुमने।

तुम्हारी आँखों में अपना अक्स देख लजाती है;
मेरी आँखों की हया जो धीरे से घटाई थी तुमने।

इन सबसे तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं; बताती है-
मुझसे केवल शिकायत ; जो दी तन्हाई थी तुमने।

है मालूम, मेरे हमकदम! जो कली महकाती है;
इतिहास में दर्ज़ न होगी; जो खिलाई थी तुमने।