Last modified on 5 मार्च 2010, at 21:58

मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त / ग़ालिब

मेहरबां होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ

ज़ोफ़<ref>दुर्बलता</ref> में ताना-ए-अग़यार<ref>शत्रुओं का व्यंग्य</ref> का शिकवा क्या है
बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूँ

ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना
क्या क़सम है तेरे मिलने की कि खा भी न सकूँ

शब्दार्थ
<references/>