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मैंने जो कहा- हूँ मैं तेरा आशिक़े शैदा-ऐ- कानेमलाहत / इंशा अल्लाह खां

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मैंने जो कहा- हूँ मैं तेरा आशिक़े शैदा-ऐ- कानेमलाहत[1]
फ़रमाने लगे हँसके "सुनो और तमाशा- यह शक्ल, यह सूरत" ?

आए जो मेरे घर में वह सब राहे करम से- मैं मूँद दी कुण्डी ।
मुँह फेर लगे कहने त‍आज्जुब से कि "यह क्या- ऐ तेरी यह ताक़त" ?

लूटा करें इस तरह मज़े ग़ैर हमेशा- टुक सोचो तो दिल में ।
तरसा करे हर वक़्त यह बन्दा ही तुम्हारा- अल्लाह की कुदरत ।।

दीवार-ए-चमन फाँद के पहुँचे जो हम उन तक- इक ताक की ओझल ।
तरसाँ[2] हो कर फ़रमाने लगे कूटके माथा- ऐ वाए फ़ज़ीहत !

शब महफ़िले होली में जो वारिद हुआ ज़ाहिद- रिन्दों ने लिपटकर ।
दाढ़ी को दिया उसकी लगा बज़रे फतूना- और बजने लगी गत ।।

शब्दार्थ
  1. मनमोहक
  2. डरकर