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मैं एक शंखमीन / कुबेरनाथ राय

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अभी तो मैं चुपचाप सुनूँगा और घृणा करूँगा!
समुद्र के हृदय में गरल है, ज्वाल है,
मोती, सीप, प्रवाल और सागर पुष्प
हाँगर, कवचमीन, झख-मकर-नक्र
और न जाने क्या-क्या अशेष अनन्त जीवन है
रूप-रतन राशि है।
इन सबसे समृद्ध सागर राजा है। क्षुब्ध होने में समर्थ है
सहस्र-सहस्र मुट्ठियाँ तान कर रहा वह लगातार क्रुद्ध-गर्जन
दे रहा धिक्कार आवर्जना और व्यभिचार को।
पर मैं उसी महान् की एक क्षुद्र संतान
मैं एक शक्तिहीन शंख-मीन
स्मृति और परमास्मृति के सारे क्रोध,
सारे आह्वान को
अपने में निरन्तर भरता हुआ भी
निरन्तर निज को भावसमृद्ध करता हुआ भी
सिर्फ चुप हूँ और घृणा कर रहा हूँ
क्योंकि मैं हूँ एक क्षुद्र, स्पर्श कातर, कामार्त्‍त
वाणीहीन स्वार्थलिप्त शंखमीन
भय और काम के जल में डूबा हुआ क्षुद्र
मात्र एक शंखमीन।

(२)
पर एक दिन वह आयेगा
जब मैं चर्म और रक्त से काम और भय से
मुक्त हो देहवल्कल त्यागकर
शुद्धतः कंकालमात्र रह जाऊँगा
तब मेरे हिया-पांजर को मिलेगा
अनागत की साँस और होंठों का सान्निध्य
और तब मैं महापिता समुद्र के उस आवाहन को
जिसे मैं पीढ़ी-दरपीढ़ी आत्मसात करता रहा
दूँगा एक दृढकण्ठ अभिव्यक्ति, उदात्त और दृढ़कण्ठकि
वंचना के दुर्ग भहराकर गिर जायेंगे
इतिहास की प्रतिशोध कामी नेदत्र उठ खड़ी होगी
और होगा नये पैगम्बर का अवतरण।
इस रौद्रधूप तप्त सिकता पर सोये हुए
मैं नहीं, मेरी अस्थि, मेरा हिया-पांजर, मेरा गद्य
प्रतीक्षा करेगा, सतत धीर प्रतीक्षा करेगा
अनागत के दृढ़मन, कम्बुकण्ठ पुरुषों की।
अतः अभी तो मैं चुपचाप सुनूँगा
और घृणा करूँगा
घृणा है कीच गली गोबर वीभत्स
तो भी अग्निबीज शब्दों की हराई में
यही परिवेशन करेगी रस और प्राण
कटु स्मृतियाँ बन जायेंगी रस और तेज
और इसी आवाहनमयी घृणा से
इतिहास पुरुष का लगा श्रम
सार्थक होगा, और जीवन होगा
उर्वर ताजा कचनार शस्यश्यामा
और तब तुम और हम और वे सब
मिलकर करेंगे दखल
पूरा हिन्दुस्तान दखल कर लेंगे
सजायेंगे क्यारियाँ खेत और उपवन
वेणुवन आम्रवन मधूक-वन
आभीर कण्ठतान और संथाल बांसुरी
मणिपुरी मुद्रायें संकीर्त्‍तन के पद
और महाकाव्य और न जाने क्या क्या
बहुत-बहुत अजान अमित, अपार
इसी से मैं अभी चुपचाप सुनूँगा और
प्रजापति रूपी घृणा का संचय करूँगा।

(३)
ओ माणिक लोभी हंस!
ओ माणिकभक्षी अभिजात हंस, सुनो-सुनो
मैं भी एक नग, एक रतन, एक समुद्र संतान
मैं भी रत्नाकर वंशीय चन्द्रसहोदर एक रत्न।
पर ओ माणिकभक्षी हंस
स्मरण रखना कि सिन्धु में वाड़व है, गरल है
मैं भी उसी हलाहल का सहोदर हूँ
यद्यपि क्षुद्र कवच-मीन शंखमीन।
तुम मेरे आवाहनमय मृत अस्थिपंजर को पचा नहीं पाओगे
अतः व्यर्थ आहत न कर लेना चंचु
ओ मृणाल भक्षी कोमल गात हंस
मुझ गरल-सहोदर समुद्र की कुलीन संतान को
मुझ अल्प मूल्य रत्न को,
जरा पहचाने रहो।