भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मैं कलियुग का नचिकेता हूँ / प्रवीन अग्रहरि

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मैं शून्य मगर सम्पूर्ण हूँ।
मैं अल्पबुद्धि मदचूर्ण हूँ।
हारा हूँ, भले विजेता हूँ!
मैं कलियुग का नचिकेता हूँ।

मैं दीन-हीन, भय में विलीन
मैं हूँ अनाथ, कुल से मलीन
मैं हूँ विचलित मैं हूँ व्याकुल
मैं हूँ विक्षिप्त मैं शोकाकुल
मैं व्यथित ह्रदय, मैं भिक्षुक हूँ
मैं बुद्ध प्राप्ति का इच्छुक हूँ
मैं पिता तिरस्कृत सन्यासी
मैं कल्पवास का प्रत्याशी

मैं मृत्युदेव के सम्मुख बैठा
प्रश्नों का व्यग्र प्रणेता हूँ
मैं कलियुग का नचिकेता हूँ।

मैं क्षुब्ध आत्मा, तीक्ष्ण बुद्धि
यायावर मांगू शुद्धि-शुद्धि
मैं ही हूँ यम का हठी शिष्य
मैं भाव शून्य, मैं हूँ अदृश्य
मैं हूँ यथार्थ मैं वर्तमान
मैं 'बुद्ध' होने का अनुमान

मैं दुविधाओं का झोला टाँगे
अनुसंधानों का विक्रेता हूँ
मैं कलियुग का नचिकेता हूँ।

यमराज मुझे तुम ज्ञान दो
जीवन मृत्यु का भान दो
चिन्हित कर दो मेरा स्वरूप
छू-कर मुझको कर दो अनूप
मुझको शर में सन्धान करो
फिर मुझ पर तुम अभिमान करो
मुझको अपना हुंकार दो
शिव शंकर का ओंकार दो
मेरे प्रश्नों को बुद्ध करो
हे परम आत्मा! शुद्ध करो।

मैं शिष्य तुम्हारा हे गुरुवर!
लो! प्राण दक्षिणा देता हूँ
मैं कलियुग का नचिकेता हूँ।