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मैं कौन / शरण कुमार लिंबाले

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यह तेजस्वी सूर्य किनके लिए ?
यह अनंत आकाश किनके लिए ?
यह विशाल जलाशय किनके लिए ?
यह विस्तृत देश किनके लिए ?
यह संसद, ये संविधान, ये लोग,
यह समाज, यह कानून किनके लिए ?
ये मनुष्य, मनुष्य लगते ही नहीं
खूंख़ार जानवरों के गिरोफ़ हैं ये,
मैं जी नहीं रहा हूँ रे यहां
सिर्फ़ मृत्यु को टाल रहा हूँ
क्षण-क्षण की मौत
पूरी ज़िन्दगी पर टँगी हुई ।
यह ज़िन्दगी भी क्या है ?
धधकती झोपड़ी में
जलते हुए जीने के लिए
मज़बूरी से की गई कोशिश !
मैं कौन ? मैं किनके लिए ?
गूँगी सत्ता, गूँगी जनता, गूँगी संस्कृति
गूँगे वेद, गूँगे शास्त्र, गूँगी मनुस्मृति ।

मूल मराठी से सूर्यनारायण रणसुभे द्वारा अनूदित