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मैं जग से कुछ सीख न पाया / हरिवंशराय बच्चन

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मैं जग से कुछ सीख न पाया।

जग ने थोड़ा-थोड़ा चाहा,
थोड़े में ही काम निबाहा,
लेकिन अपनी इच्छाओं को मैंने सीमाहीन बनाया।
मैं जग से कुछ सीख न पाया।

जग ने जो दिन-बीच कमाया,
उसे निशा में किया सवाया,
मैंने जो दिन को जोड़ा था, उसको मैंने शाम गँवाया।
मैं जग से कुछ सीख न पाया।

जग ने जो प्रतिमा ठुकराई,
झुककर उसके आगे आई,
फिर-फिर झुका उसी वेदी पर जहाँ गया फिर-फिर ठुकराया।
मैं जग से कुछ सीख न पाया।