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मैं तल्ख़ी-ए-हयात से घबरा के पी गया / साग़र सिद्दीक़ी

मैं तल्ख़ी-ए-हयात से घबरा के पी गया
ग़म की सियाह रात में घबरा के पी गया

इतनी दक़ीक़ शय कोई कैसे समझ सके
यज़्दाँ के वाक़िआत से घबरा के पी गया

छलके हुए थे जाम परेशाँ थी ज़ुल्फ़-ए-यार
कुछ ऐसे हादसात से घबरा के पी गया

मैं आदमी हूँ कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर
मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया

दुनिया-ए-हादसात है इक दर्दनाक गीत
दुनिया-ए-हादसात से घबरा के पी गया

काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या
फूलों की वारदात से घबरा के पी गया

‘साग़र’ वो कह रहे थे कि पी लीजिए हुज़ूर
उन की गुज़ारिशात से घबरा के पी गया