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मैं तुमसे क्या कहूँ, ऎ रूस! / येव्गेनी येव्तुशेंको

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मैं
तुमसे क्या कहूँ
ऎ रूस !
तेरे मैदान भी
उतने ही सुन्दर हैं
जितने सुन्दर वन हैं तेरे
उनकी आवाज़ में
अपनी आवाज़ मिलाने दे मुझे

मैं क्या
चुप रह जाऊँ
ऎ रूस !

बहुत ज़्यादा
सलीबें हैं
तेरे कब्रिस्तानों में
और ऎसी भी कब्रें बहुत
जिन पर नहीं सलीब

मैं कैसे
मदद करूँ तेरी
ऎ रूस!

वहाँ
कवि क्या मदद करेगा
जहाँ सत्ता
प्राय: कवियों को
देश निकाला दे देती है

रूस- मेरी देवि की छवि है
तेरी रोटी- मेरी हवि है
तेरा दुख- मेरा दुर्भाग्य
तेरा भाग्य- मेरा भी भाग्य