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मैं तुम्हारे चरण चिन्हों पर चलूँ / उमाकांत मालवीय

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मैं तुम्हारे चरण चिन्हों पर चलूँ
मैं तुम्हारे दिए साँचे में ढलूँ
ऐसा दुराग्रह क्यों
ऐसी दुराशा क्यों

अनुकरण अनुसरण से यदि दूर हूँ
यह न भ्रम हो दर्प मद से चूर हूँ
भीख में पाए उजाला सूर्य से
मैं निकम्मे चन्दर्मा सा ही जलूँ

और कल की चूठनों पर ही पलूँ
ऐसा दुराग्रह क्यों
ऐसी दुराशा क्यों

भूमिका कल की बड़ी थी मानता
आज को जो दाय वह भी जानता
दूँ दुहाई सदा स्वर्ण अतीत की
मूँग छाती पर दिवंगत की दलूँ

आज का दायित्व कन्धों पर न लूँ
ऐसा दुराग्रह क्यों
ऐसी दुराशा क्यों