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मैं तुम्हारे पास नहीं होता / अमरजीत कौंके

मैं
तुम्हारे पास नहीं होता
भले ही
तुम मुझे असीम प्यार करती
मुझ पर
अपना तन मन निछावर करती
लेकिन तुम्हारे संग लिपटा हुआ भी
मैं तुम्हारे पास नहीं होता

वैसे तो मैं भी
तुमसे बहुत प्यार करने का
दंभ करता हूँ
बार-बार किसी प्यासे मरूस्थल की तरह
तुम्हारी गोद में आकर गिरता हूँ
पूरे का पूरा अपनी रेत संग
तुम्हारे नीर में भीगने के लिए

लेकिन भीतर
मन के, ठीक भीतर
वह कौन सी जगह है
जो बिल्कुल खुश्क रहती है
जो पानी की बूँद से भी डरती है
सच मानना
वह जगह बिल्कुल खुश्क रहती है

मैं मन के उस खुश्क टुकडे़ पर
समुद्र बिछा देना चाहता हूँ
एक नखलिस्तान
लहरा देना चाहता हूँ

पर मन की कितनी
परतों में बँटा हुआ मैं
आज का मानव
तुम्हारे नीर में भीग कर भी
भीतर से
बिल्कुल खुश्क रहता हूँ ।


मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा