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मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ / शिरीष कुमार मौर्य

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मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ

मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ
जीवन और मृत्यु
और इन दोनों के बीच की ढेर सारी अबूझ ध्वनियों से भरी
मेरी भाषा
रह-रहकर
तुमको पुकारती है

मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ
उन सभी चीज़ों के साथ जो तुमसे बहुत गहरे जुड़ी हैं
तुम इसे मेरा बनाया एक भ्रम भी कह सकती हो
या फिर याद करने का एक अधिक गाढ़ा और चिपचिपा तरीका
जो तंग करता है
खीझ उठता है जिससे मन
जिसे कभी छोड़ा नहीं जा सकता
और अपनाया भी नहीं जा सकता
हर किसी के साथ

उसी अद्भुत और आत्मीय तरीके से
मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ

और जानता हूँ कि यह सिर्फ मेरा तरीका नहीं है
तुम्हारा भी है


बहुत सारी बर्फ गिरी है यहाँ
लगभग 7000 हज़ार फीट पर
जहाँ मैं रहता हूँ फिलहाल
शब्दहीन यह गिरती ही जाती है पहाड़ों पर
पेड़ों पर
मकानों पर
लोगों पर
विचारों पर
और बेतार इधर से उधर आती-जाती यादों पर

उसके बोझ से चरमराती टूटती हैं डगालें
ज़मीन पर गिरते चटखते हैं बिजली के तार
पाइपों में जम जाता है पानी

रक्त बहता ही रहता है लेकिन नसों में
निर्बाध
चलता रहता है कारोबार
पहुँच ही जाते हैं अपने काम पर काँपते हुए मेहनतकश कामगार
खेलते ही रहते हैं बच्चे
और उतना ही बरजती जाती हैं उन्हें उनकी माँएँ
किसी भी सम्भावित चोट-चपेट के खिलाफ
उमड़ते-घुमड़ते आते हैं
बादल
झाँकता ही रहता है लेकिन रह-रहकर
उन्हें चीरता
सूर्य हमारे इस गोपनतम
दुर्लभ जीवन का
जिससे बिखरती धूप का रंग
हमारे रिश्ते की तरह साफ़ और सुनहरा है
उतना ही गुनगुना और
गर्वीला भी


अभी
मेरे जीवन में वसन्त है पूरे उफान पर और पूछना चाहता हूँ मैं
कि क्या तुम थोड़ा-सा लोगी?

तुम्हारे भीतर की आँधी में लगातार झर रहे हैं पत्ते और माँगना चाहता हूँ मैं
उन में कुछ सबसे नाज़ुक
सबसे पीले
क्या तुम मुझको दोगी?


कुछ दिन में फागुन आएगा
              और आएंगी गमकती हवाएँ वे
सिन्दूरी रंगत वाली
गए बरस तुमने जिनके बारे में मुझको बतलाया था
यों यह रंग भी सबको दिखाई कब देगा !

शायद हम मिलेंगे दुबारा
अपने-अपने भीतर एक बियाबान लिए
जहाँ बहुत चुपचाप दौड़ते होगे कुछ खरगोश छोटी-चमकीली आँखों वाले
एक झाड़ी से दूसरी झाड़ी के बीच
शरण्य की खोज में
हम उन्हें एक-दूसरे की ज़मीन पर आसरा देंगे

जीव-जगत में पशु-पक्षियों के लिए तुम्हारा प्यार
और मनुष्य जाति को धिक्कार
मुझसे छुपा नहीं है

अगर कभी मैं बदल पाया तुम्हारे हिस्से की दुनिया
तो सबसे पहले बदल दूँगा
इस धिक्कार को
जो तुम्हें थोड़ा अमानवीय और आवेगहीन बनाता है
कितना आश्चर्यपूर्ण है यह कि तुम्हारे लिए अभी और प्रकट होना है दुनिया को
और मेरे लिए इसे अब बन्द होते जाना है
              गो तुम मुझसे 9 बरस पहले आयीं इसमें
तब भी बहुत कुछ है जो तुमसे पोशीदा लेकिन मुझ पर नुमाया है

बहुत दुख है यहाँ
बहुत अपमान
बेक़द्री रिश्तों की
थेथर आँसुओं की धार
बेहद डराता है यह जगह-जगह से टूटता
बिखरता
झूटों और मक्कारों से भरा संसार

लड़ने के नाम पर इस सबके खिलाफ
मैंने सिर्फ प्रेम किया है
क्योंकि इससे ज़्यादा साहस के साथ
                  और कुछ किया ही नहीं जा सकता
किसी भी समय और काल में
कोई दूसरा तरीका नहीं बदल देने का
                  दिन-दिन निष्ठुर होती जाती इस दुनिया को
सिवा इसके कि आप वह करें जो कहीं नहीं है
फैल जाने दें उसे
ढाँप लेने दें कम से कम आपके सिर के ऊपर भर का
थोड़ा-सा आसमान

आज
मेरे पास एक सीधी और सच्ची लड़की का
जोश और दिलासा से भरा
जीवन भर का साथ है
जहाँ थकने लगते है कदम
दुखने लगता है हृदय
वहाँ मरहम लगाता हमेशा एक ऊष्मा भरा हाथ है

और तुम वहाँ अकेली हो जीवन की झंझा में
निपट अकेली

अपनी इस सर्वोच्च उपलब्धि और तुमसे जुड़ी एक छोटी-सी हताशा के साथ
मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ
बार-बार!

क्या तुम्हे भी अपनी यादों में सुनाई दे रही है
कितनी ही ध्वनियों से भरी
मेरी यह शब्दहीन आवाज़ ?