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मैं तो सोय रही सपने में / ब्रजभाषा

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   ♦   रचनाकार: घासीराम

मैं तो सोय रही सपने में, मोपै रंग डारौ नन्दलाल॥
सपने में श्याम मेरे घर आये, ग्वाल बाल कोई संग न लाये,
पौढ़ि पलिका पै गये मेरे संग, टटोरन लागे मेरौ अंग,
दई पिचकारी भर-भर रंग॥

दोहा- पिचकारी के लगत ही मो मन उठी तरंग
जैसे मिश्री कन्द की, मानों पी लई भंग॥
मानो पी लई भंग, गाल मेरे कर दिये लाल गुलाल॥ 1॥
खुले सपने में मेरे भाग, कि मेरी गई तपस्या जाग,
मनाय रही हंसि-हंसि फाग सुहाग।

दोहा- हंस-हंसि फाग मनावत, चरन पटोलत जाउँ
धन्य-धन्य या रैन कू, फिर ऐसी नहिं पाउँ॥
फिर ऐसी नहि पाउँ, भई सपने में माला माल॥ 2॥
इतने में मेरे खुल गये नैना, देखूँ तो कछु लैन न दैना।
पड़ी पलिक पै मैं पछितात, कि मीड़त रह गई दोनों
हाथ। मन की मन में रह गई बात।

दोहा- मन की मन में रह गई, है आयौ परभात।
बज्यौ फजर कौ गंजर, रहे तीन ढाक के पात॥
तीन ढाक के पात, रहीकंगालिन की कंगाल॥ 3॥
होरी कौ रस रसिकहि जानें, रसकूँ कूर रहा पहिचाने।
जो रस देखौ ब्रज के मांहि, सो रस तीन लोक में नांहि,
देखके ब्रह्मादिक ललचाँय॥

दोहा- ब्रह्मादिक ललचावते, धन्य-धन्य ब्रजधाम।
गोबरधन दसबिसे में, द्विजवर घासीराम॥
द्विजवर घासीराम, सदा ये कहैं रसीले ख्याल॥ 4॥