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मैं थक गया हूँ / तेनजिन त्सुंदे

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मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ दस मार्च के उस अनुष्ठान से
धर्मशाला की पहाड़ियों से चीख़ता हुआ ।

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ सड़क किनारे स्वेटर बेचता हुआ
चालीस सालों से बैठे-बैठे — धूल और थूक के बीच इन्तज़ार करता

मैं थक गया हूँ
दाल-भात खाने से —
और कर्नाटक के जंगलों में गाएँ चराने से ।

मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ मजनू के टीले की धूल में
घसीटता हुआ अपनी धोती ।
मैं थक गया हूँ
थक गया हूँ लड़ता हुआ उस देश के लिए
जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं ।