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मैं था / वीरू सोनकर

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मैं तुम्हारे संगीत में नहीं, अपने रुदन में था
रुदन की हिचकियों में
और घुटी अबोली शिकायतों में था

वहाँ था जहाँ सिर्फ मैं था

तुम्हारी इसी दुनिया में जहाँ तुम मानते थे कि मैं था
और मैं तुम्हारे मानने में भी पूरी विनम्रता के साथ
वहाँ नहीं था
मैं उस स्वीकारोक्ति में था
जहाँ मैं ख़ारिज कर रहा था
कि मैं कहीं और नहीं तुम्हारे ही साथ हूँ

तुम्हारे साथ चाय की टेबल पर
और विषाद को झुठलाती हँसी में था,

मैं वहाँ-वहाँ था जहाँ-जहाँ तुम्हारी शंका थी कि मैं नहीं था

मैं तुम्हारे हर्ष में नहीं, अपने विलाप में था

जब मैं कहना चाहता था
तब न कह पाने में था

क्रोध में खुद को समझाते हुए था
अकेले में खुद से की गयी बदतमीजियों में था!

नृत्य में था तुम्हारे साथ
और तालियों से औपचारिकताओं का भार उतारने में था

उस हर्ष-दृश्य के पीछे धुंधलाये अदृश्य में था
अदृश्य के पर्दो को तालियों की गूंज से चीरते हताश प्रयासों में था
तुम्हारे नृत्य में नहीं था, पर वहीँ था!

मैं पूर्णता में नहीं, अपूर्णता के अहसास में था
जब पूर्णता का तेज़ नाद स्वर मुझे पीछे धकेल रहा था
मैं अपूर्णता के विलाप में रिस रहे जीवन में था

तुम्हारे संगीत में नहीं अपने रुदन में था

हाथ की लकीरो से बाहर
किस्मत की उड़ती गंध को मुट्ठी में भर
दौड़ भागने में नहीं,
उसके पकड़ में आने के किस्से-कहानियों में था!

और जब तुमने सोचा कि मैं सच में नहीं हूँ
अपने होने की अनसुनी धित्तकार को
चुपचाप सुनते हुए
और खुद को अपने न होने की दी गयी दिलसाओं में था

तुम्हारे संगीत में नहीं, अपने रुदन में था!

मैं वहाँ-वहाँ था
जहाँ हो सकने की स्वीकार्यताएं थी
पर मैं अस्वीकार्यता में था,

और था,
विलम्ब से आने में
और शीघ्र चले जाने में
पहचाने जाने की हर हड़बड़ाहट में मैं था

तुम्हारे उत्सव में नहीं था, अपने मातम में था

बोलने की हर वजह में,
हो सकने की तमाम संभावनाओ के बाद
उग आती किसी कायरता में,
जहाँ वीरता उपहास के पर्दो के पीछे धकेल दी जाती थी
अपने चेहरे को किसी पर्दे सा ओढ़े मैं था

और मैं जहाँ भी था
वहाँ हो सकने या न हो सकने की आशंकाओं में बिंधा हुआ था

पर मैं तुम्हारे संगीत में नहीं, अपने रुदन में था