भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

मैं भीनी रात-सी इस आसमान में छा रही हूँ / मंजुला सक्सेना

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मैं भीनी रात-सी इस आसमान में छा रही हूँ
कुहुक मल्हार-सा उर में गगन के गा रही हूँ ।

कौन कहता है सच सुना उसने ?
कौन बोला है सच ज़माने से ?
एक चुप्पी है राज़ रहती है
बात बन जाती है ज़माने में ।


रचनाकाल : 25 फ़रवरी 2009