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मोती गिरा / उषा उपाध्याय

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आँख से मोती गिरा तो क्या हुआ, पूछो नहीं
वेदना की बाढ़ में क्या-क्या गया, पूछो नहीं ।

आटे जैसा बन हवा में इस कदर उड़ता रहा,
आफ़त के दो पत्थरों ने क्या-क्या पीसा, पूछो नहीं ।

बंद रखने मुठ्ठी को क्या कोशिशें कीं रात-दिन,
यातना के हिम में क्या-क्या गला, पूछो नहीं ।

पता नहीं था दुख और पीपल के साम्य का,
छत और छाती चीर कर क्या-क्या उगा, पूछो नहीं ।

कहाँ पता था कि यह कोई चिनगारी है,
लो, समय के हाथ से क्या-क्या जला, पूछो नहीं ।