भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मोर का पंख / रमेश तैलंग

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बीचों-बीच किताब के
मैंने रखा सँभाल के
एक मोर का पंख
सुनो जी, एक मोर का पंख।

जिसको एक सहेली ने
मुझे दिया था प्यार से।
एक मोर पंख
सुनो जी, एक मोर का पंख।

मखमल-सा कोमल-कोमल
लगे छुओ जब हाथ से।
एक मोर का पंख
सुनो जी, एक मोर का पंख।

पप्पी देती हूँ उसको
रोज सवेरे याद से।
एक मोर का पंख
सुनो जी, एक मोर का पंख।