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मोहिं कोउ अपनी ही करि मानो / स्वामी सनातनदेव

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राग वागेसरी, तीन ताल 28.6.1974

मोहिं कोउ अपनो ही करि मानो।
हूँ न कहूँ कुछ भी मैं प्यारे! फिर क्यों मोहिं अलग करि जानो॥
कहा न हो तुम मेरे प्रीतम! सब के सब कुछ-तुमहिं बखानों।
फिर अलगाव रह्यौ का मेरो, अपनो ही रज-कन कोउ जानों॥1॥
तुम वारिद, मैं बूँद प्रानधन! तुम जलनिधि, जल-कन मोहिं मानों।
तुव पद-रति ही है गति मेरी, और न कोउ सम्पत्ति मैं जानों॥2॥
मेरी सम्पति मिलै मोहिं प्रिय! ताहीमें मैं-पन मैं भानों[1]
मैं न रहूँ रह जाय एक रति-यही एक सद्गति मैं जानों॥3॥

शब्दार्थ
  1. मिटा दूँ, मिला दूँ