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मोह अमरबेल सा / संतोष श्रीवास्तव

मोह अमरबेल-सा छा जाता है
जीवन वृक्ष पर
परजीवी मोह
सोख लेता है
सारी शक्ति, सारी ऊर्जा

उजालों में अंधेरे के बीज बोता
ज्वार-भाटे के गणित में
समुद्र की तलहटी तक
लहरों को भींचता

नष्ट कर डालता है
विवेक के कोमल तंतु
तीक्ष्ण उद्वेगों से
उबर कहाँ पाता है जीव

कितने वितानों में
रच डालता है मोह
सातों भावनाएँ
प्रेम के सातों रंग
संगीत के सातों सुर
सात समुंदर पार का
तिलस्मी जाल

फिर कहीं से धर जाता है
हथेली पर क्षीण ,जर्जर धागे
जिनसे जीवन के पैबन्दों की
तुरपाई नहीं हो सकती

कर जाता है मोह
कितना असहाय
जब कि फिसल जाता है जीवन
उम्र को पोर पोर छीलता