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मौसम की आनाकानी / निर्मल शुक्ल
Kavita Kosh से
चिंगारी से शर्त लगी है
आंधी से तकरार नहीं है
नहीं पसीजीं
गर्म हवाएँ
रेत हो गए घर सपनों के
एक दूसरे के
कांधों पर
रो लेते हैं सर अपनों के
झंझावातों से अठखेली
करने का त्यौहार नहीं है
है मौसम की
आनाकानी
उतर गए ऋतुओं के तार
हँसकर पतझड़
छेड़ गया है
मधुमासों के साज-सँवार
सुर्ख़ हो गई धवल चाँदनी
लेकिन चीख़-पुकार नहीं है
इतने पर भी
कानों में कुछ
दे जाती संवाद दिशाएँ
दूर कहीं इस
उठापटक में
होंगी फिर अनुरक्त ऋचाएँ
स्थिति अब इन चिकनी-चुपड़ी
बातों को तैयार नहीं है