मौसम मिज़ाज अपना बदलने लगा है यार
वो शाल ओढ़ घर से निकलने लगा है यार
फैंका था जिस दरख्त़ को कल हम ने काट के
पत्ता हरा फिर उस से निकलने लगा है यार
ये जान साहिलों के मुक़द्दर संवर गये
वो गु़स्ले-आफ्त़ाब को चलने लगा है यार
उस का इलाज ख़ाक करेगा कोई तबीब
वो ज़हर जो हवास में पलने लगा है यार
उठ और अपने होने का कुछ तो सुबूत दे
पानी तो अब सरों से निकलने लगा है यार
तुझ से तो ये उमीद रखी ही न थी कभी
तू भी हमारे नाम से जलने लगा है यार
मश्रिक में जो तुलूअ हुआ था बवक्त़े-सुब्ह
मग़्रिब में वक्त़े-शाम वो ढलने लगा है यार