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यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे? / कविता भट्ट

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यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे?

पीड़ा में कराहते पहाड़ों का सच
दर्द- खेतों से पेट न भरने का
बर्तनों-गागरों के प्यासे रहने का
घरों के उजड़ने, खाली होने का
वनों के कटने, वानर-राज होने का

यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे?

सच-सड़कों पर सजती मौतों का,
रोते शिशुओं और सिसकती औरतों का,
खाली होते गाँवों और धधकते वनों का,
खोते अपनेपन, संवेदनहीन रिश्तों का।

यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे?

सच- खाली होती पंचाचतों स्कूलों का,
सूखते स्रोतों, खोते बुराँस के फूलों का,
बुनते हुए सड़को के अर्थहीन जालों का,
बिकते मूल्यों, उफनते राजनेताओं के वादों का

यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे?