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यहाँ कोई धरम नहीं मिलता / 'सज्जन' धर्मेन्द्र

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यहाँ कोई धरम नहीं मिलता।
मयकदे में वहम नहीं मिलता।

किसी खरगे की जाँ गई होगी,
कोट यूँ ही नरम नहीं मिलता।

आग दिल में नहीं लगी होती,
अश्क इतना गरम नहीं मिलता।

कोई अपना ही बेवफ़ा होगा,
यूँ ही आँगन में बम नहीं मिलता।

भूख तड़पा के मारती है पर,
कहीं कोई ज़ख़म नहीं मिलता।