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यहाँ सभी है डरे-डरे से / विपिन सुनेजा 'शायक़'

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यहाँ सभी हैं डरे- डरे से
दिये हों जैसे बुझे-बुझे से

सफ़र अभी तो शुरू हुआ है
हैं क्यों मुसाफ़िर थके-थके से

बहार आने की है निशानी
हैं घाव मेरे हरे-हरे से

तुम आ रहे हो ये तय था लेकिन
ख़याल आए बुरे- बुरे से

उन्हीं के मैले हैं मन ज़ियादा
हैं जिन के चेहरे धुले-धुले से

वो चल दिए ख़त्म कर के रिश्ते
खड़े रहे हम ठगे-ठगे से