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यहीं कहीं है / राम सेंगर

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कोर-कसर सबने निकाल ली
बचे रहे, इतना ही ख़ूब ।

अपरिचयों की तनी हुई, इस
मुई घुटन की परतें खोल ।
बिला गए दिन उबरें शायद
फाँसे पड़े कुएँ में डोल ।
निःश्रेयश की चाह न कोई
उगा रहे बँजर में दूब ।

हँसी, यँत्रणा की हमजोली
फूल और काँटे का सँग ।
यह क्या कम है, सीख लिया है
ऐसे में जीने का ढँग ।
खुली हवा में ले आए हैं
फफरून्दे हिस्सों की ऊब ।

यहीं कहीं था, यहीं कहीं है
आशा का नन्हा ख़रगोश ।
झाड़ी नहीं खा गई उसको
है इतना हमको भी होश ।
दुबक गया है, ढूँढ़ रहे हैं
मन की गहराई में डूब ।

बचे रहे, इतना ही ख़ूब ।