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यह मन मेरो कह्यौ न मानें / स्वामी सनातनदेव

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राग गुणकली, तीन ताल 21.6.1974

यह मन मेरो कह्यौ न मानें।
बहुत भाँति समुझाय थक्यौ, पै यह अपनी ही तानें॥
तुम ही हो मेरे जीवन-धन-जदपि यहू यह जानें।
तदपि वृथा इत-उत ही भटकत, मैं आयो नकबानें॥1॥
मेरे तो सर्वस्व तुम्हीं-यह मैं मानूँ जग जानें।
तदपि न तुमसों नेह करत यह, का याकी यह बानें॥2॥
तरसत ही सब वयस बितायी, भई न रसकी भानें।
विलखि-विलखि कब लौं वय काटूँ, अब तो प्रान पिराने॥3॥
अब यह जरनि न सहन होत है-का तुमसों यह छानें।
तुम ही याहि सधावहुगे तो भले बने यह बानें॥4॥
मैं तो सौंपि चुक्यौ सब तुमकों, तुम जानों हित-हानें।
मेरे हानि-लाभ तुम ही सब, का तुमसों हठ ठानें॥5॥