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यात्रा / स्वरांगी साने

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(1)
पहला नियम होता है
यात्रा पर जाने का
कि अनावश्यक बोझ नहीं ढोते
तुमने उतार फेंका मुझे।

(2)
उसी दिन
दूर कर दिया था तुमने मुझे
और मैं समझ रही थी
तुम लौट आओगे फिर मेरे पास।

(3)
मैं तब भी
कहती रही
मुझे छोड़कर मत जाओ
तुम साफ़-साफ़ कह रहे थे
साथ नहीं ले जा सकता
मैंने मान ली
हमेशा की तरह
तुम्हारी बात।

(4)
हँस कर कहा जाता है न अलविदा
जैसे तुम कह रहे थे
मेरे आँसू इतनी-सी बात नहीं समझ पाए
और तुम
नाराज़ हो गए।

(5)
पूछ रहे थे क्या लाऊँ
मैं फफक उठी - लौट आओ।

(6)
नदी, पर्वत, तालाब, झरने
फूल, पौधे
इमारतें-खंडहर
तुम निकल पड़े दुनिया देखने
मेरी तो पूरी दुनिया ही तुम थे
जिसे ले गए थे अपने साथ
मुझे अकेला छोड़।

(7)
पुराना विस्मरण हो
तो नया याद रहता है
विस्मृति में चली गई हूँ मैं
तुम लौटे हो नई स्मृतियाँ लेकर।

(8)
कह रहे थे
तुम्हारी दुनिया में
अब
मेरी जगह नहीं रही
पर गए तो तुम थे
मैं तो अब भी
यहीं हूँ
जस की तस।

(9)
ओह तुमने कोई
अंगूठी भी नहीं दी
कि उसका वास्ता देकर ही
तुम्हें याद दिला पाती
पर
मेरे पास
न तो ऐसी कोई अंगूठी है
न ही तुम हो।

(10)
ये तुम्हारे दिये दु:ख हैं
तुम्हारी दी पीड़ा है
यात्रा से लौटे हो
मेरे लिए
ये कैसे उपहार लेकर?