भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

याद का फूल सर-ए-शाम खिला तो होगा / हसन 'नईम'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

याद का फूल सर-ए-शाम खिला तो होगा
जिस्म मानूस सी ख़ुशबू में बसा तो होगा

क़तरा-ए-मय से दबा रात न तूफ़ान-ए-तलब
मुझ पे जो बीत गई रात सुना तो होगा

कोई मौसम हो यही सोच के जी लेते हैं
इक न इक रोज़ शजर ग़म को हरा तो होगा

ये भी तस्लीम कि तू मुझ से बिछड़ के ख़ुश है
तेरे आँचल का कोई तार हँसा तो होगा

वो न मानूस हों कुछ ख़ास अलाएम से ‘हसन’
एक क़िस्सा मिरी आँखों ने कहा तो होगा