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याद सताती है मुन्ना / आराधना शुक्ला

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चौबारा-चौखट किलसाते और बिराता छप्पर
तेरे पीछे दीवारें भी बहुत चिढ़ाती हैं मुन्ना
घर आ जा रे, मुझको तेरी याद सताती है मुन्ना

चिड़ियाँ तक ना आतीं घर में पसरा है सन्नाटा
इधर-उधर सब बेसुध ऊँघैं का मचिया का पाटा
जैसे-जैसे दिन ढ़लता बेचैनी बढ़ती जाये
किसको ख़ुद से फुर्सत जो मुझसे बोले-बतियाये

पिछली दफ़े तू ले आया था घड़ी अलारम वाली
वही घड़ी टिक-टिक करके मुझसे बतियाती है मुन्ना

दो दिन ते तपती बुखार मा देंही भई अँगीठी
बैठ सिरहाने खों-खों करते अदरक-लौंग-मुलेठी
दाँई आँख मा डेरा डाले पड़ा हुआ है माढ़ा
बदन पिराता गला बंद है कौन बनाये काढ़ा

कोई न लगाता कोलगेट अब डाँट-डपटकर मुझको
जब चूल्हे की लपटें मेरा हाथ जलाती हैं मुन्ना

जल के बिना सूखती तुलसी निकली नहीं कुचईया
खड़ी दुआरे देखे मुझको, गुर्राती है गईया
चादर ओढ़ पड़ी आँगन मा बूँद अकासी गिरती
झुलस रहा तन भींग रहा है भींग रही है धरती

चादर से होकर मुझतक आती पानी की बूँदे
माथे पर ठंडी-ठंडी पट्टी धर जातीं हैं मुन्ना

खाली गलियारा देखूँ तो आँखें भर आती हैं
तेज़ हवायें भरमाने को कुंडी खटकातीं हैं
सुलग रहे मन पर चढ़ जाती है यादों की सीलन
झूठे वादे लेकर तेरी चिट्ठी आ जाती है

दिन भर उखड़ रही साँसों की आँधी से लड़-लड़कर
देर रात इन आँखों की ढिबरी बुझ जाती है मुन्ना
घर आ जा रे मुझको तेरी याद सताती है मुन्ना