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याद है / विजय कुमार पंत

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याद है...
वो तुम्हारा
चोटी मैं फंसी कंघी को निकालना
टूटे बालों को रूआंसी हो निहारना

मेरे कानों में
कागज़ डाल कर
मुझे अचानक
सोते से उठाना..
फिर डर कर भाग जाना

याद है..
वो सारा अनमोल समय
मासूम बचपन
लेकिन उन सबके बीच
स्मृतियों में
एक ऐसी बात है
जो मेरे लिए
जन्म जन्मान्तरों की सौगात है

मेरा पहली बार
घर से बहार जाना
तुम्हारी वो नम आंखें
और वो शब्द
"भैया ज़ल्दी आ जाना
और मेरे लिए
ढेर सारी "कविता" लाना

ये शब्द नहीं
मेरे लिए युगों युगों तक
एक स्वर्णिम उपहार है ,
एक बहन का निश्छल
प्यार है ....

ये शब्द प्राण है
जो भी लिखता हूँ
तुझे ही समर्पित है ,
तू मेरा सर्वस्व है
मेरी कविताओं की जान है