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यावुन त् बुजर / अब्दुल अहद ‘आजाद’

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जोबन है उपवन में खिल आया गुलाब
और बुढ़ापा है मज़ार पर उगा सोसन [1] का
जोबन काँटों पर भी फूलों-सा रीझे
और बुढ़ापा फूलों या काँटों से एक समान सीझे
जोबन घाम है सावन की, हार प्रफुल्लित और बयार वासंती
और बुढ़ापा ठंड माघ की, ‘पाचाल’ पहाड़ों पर खाइयों में
गहरे जमे हुए हिमकण।
जोबन उछाह, लय प्रकट करे, विकल जोश संगीत भरा
और बुझ़ापा हाय हाय पीड़ा की, टूटे तारों का टूटा सा स्वर
प्यार की आग जवानी है, संगीत दर्द का, आकांक्षा का जोश
बुझी आग की, अंगारों की, बड़े प्रयासों की है राख बुढ़ापा
जोबन का मतवाला दुनिया में बेफ़िक्र घूमे
बुज़दिल कमज़ोर बुढ़ापे पर बलशाली बल आज़माए
यौवन है फूलों का दीवाना मनुष्य, नए उपवनों पर रीझे
उजड़ी हुई बहारों का अवशेष बुढ़ापा, दाग़ एक अवसाद का
जोबन बाग़ ज़िन्दगी का है, भोगें आशिक़, मनमौजी
और बुढ़ापा दूर बस्तियों से वीराना, गुफा दर्द की निर्जन
जोबन ताज़ा खून शिराओं में जीवन का, दौड़ फिर रहा
और बुढ़ापा बदमिस्मत लोगों को भीतर से जर्जर करता है
भँवर समंदर का, यौवन मँडराए अपने इर्द-गिर्द
और बुढ़ापा धूल का रेला, सूखे नद के तल का
जोबन है जीवंत उमंगें, असफलता हसरतें बुढ़ापा
दास बेबसी का है बुढ़ापा, जोबन स्वामी अधिकारों का
इसीलिए ‘आज़ाद’ ने हके दीवाने सब लोग यहाँ
जोबन और मजूरों का, है बुढ़ापा पूँजीपतियों का।

शब्दार्थ
  1. पीले फूल जो मज़ारों के आसपास की ज़मीन में खिलते हैं