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ये चाँद है सहमा हुआ ख़ामोश नहीं है / कांतिमोहन 'सोज़'

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ये चाँद है सहमा हुआ ख़ामोश नहीं है ।
ख़ामोश नज़र आता है ख़ामोश नहीं है ।।

इस सोई हुई राख के अम्बार के नीचे
लावा है चहकता हुआ ख़ामोश नहीं है ।

पेशानी[1] की वादी में पसीने का ये दरिया
अफ़्सूं[2] है छलकता हुआ ख़ामोश नहीं है ।

ग़ुंचों से ढलक जाती है चुपचाप जो शबनम
गिरिया[3] है दहकता हुआ ख़ामोश नहीं है ।

ख़ामोशी से लबरेज़ नज़र आती है महफ़िल
एक सुर है चटख़ता हुआ ख़ामोश नहीं है ।।

7-7-1983

शब्दार्थ
  1. माथा
  2. जादू
  3. आँसू