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ये जो अल्फ़ाज़ को महकार बनाया हुआ है / जलील आली

ये जो अल्फ़ाज़ को महकार बनाया हुआ है
एक गुल का ये सब असरार बनाया हुआ है

सोच को सूझ कहाँ है के जो कुछ कह पाए
दिल ने क्या क्या पस-ए-दीवार बनाया हुआ है

पैर जाते हैं ये दरिया-ए-शब-ओ-रोज़ अक्सर
बाग़ इक सैर को उस पार बनाया हुआ है

शौक़-ए-दहलीज़ पे बे-ताब खड़ा है कब से
दर्द गूँधे हुए हैं हार बनाया हुआ है