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ये मशवरे बहम उठे हैं चारा-जू करते / अज़ीज़ लखनवी

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ये मशवरे बहम[1] उठे हैं चारा-जु करते
अब इस मरीज़ को अच्छा था क़िबलरु करते

कफ़न को बाँधे हुए सर से आए हैं वरना
हम और आप से इस तरह गुफ़्तगू करते

जवाब हज़रत-ए-नासेह[2] को हम भी कुछ देते
जो गुफ़्तगू के तरीक़े से गुफ़्तगू करते

पहुँच के हश्र के मैदान में हौल क्यों है 'अज़ीज़'
अभी तो पहली ही मंज़िल है जूस्तजू[3] करते

शब्दार्थ
  1. साथ
  2. नसहीत करने वाला
  3. इच्छा