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ये शहर अपनी इसी हा-ओ-हू से ज़िंदा है / तालीफ़ हैदर

ये शहर अपनी इसी हा-ओ-हू से ज़िंदा है
तुम्हारी और मिरी गुफ़्तुगू से ज़िंदा है

कुछ इस कदर भी बुराई नहीं है मज़हब में
जहान कलमा-ए-ला-तक़नतू से ज़िंदा है

हम अपनी नफ़स-कुशी की तरफ़ नहीं माइल
कि अपना जिस्म तो बस आरज़ू से ज़िंदा है

अब उस के बाद बताएँ तो क्या बताएँ हम
तमाम क़िस्सा-ए-मन है कि तू से ज़िंदा है

हम इस के बाद भी सरगर्म-ए-ज़िंदगी हैं कि दिल
बस एक क़तरा-ए-ताज़ा-लहू से ज़िंदा है