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योजना / शंकरानंद
Kavita Kosh से
काग़ज़ पर जो बनाई जाती है
वह ज़मीन पर उतरते हुए
कुछ और हो जाती है
जैसे मनुष्य के हित में
शुरू हुआ कार्यक्रम
कब मनुष्य विरोधी हो जाता है
इसका एहसास तक नहीं होता
जलता हुआ जंगल
एक दिन वसन्त को राख कर देता है
सूखती हुई नदी
विलुप्त हो जाती है
ढहते हुए पहाड़
गेंद की तरह लुढ़कने लगते हैं
इस तरह एक नई शृंखला
तैयार होती है और
अच्छा भला शहर
एक दिन हरसूद होकर डूब जाता है !