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रंगे-दुनिया कितना गहरा हो गया / मदन मोहन दानिश

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रंगे-दुनिया कितना गहरा हो गया
आदमी का रंग फीका हो गया

डूबने की ज़िद पे कश्ती आ गई
बस यहीं मजबूर दरया हो गया

रात क्या होती है हमसे पूछिए
आप तो सोये, सवेरा हो गया

आज ख़ुद को बेचने निकले थे हम
आज ही बाज़ार मंदा हो गया

ग़म अँधेरे का नहीं दानिश मगर
वक़्त से पहले अँधेरा हो गया