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रमोलिया-2 / अनिल कार्की

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उदास बखत के
रमोलिया[1]
अभी उदासी का गीत गा

देखना रे खिलेगा एक दिन जंगलों में बुराँस
भरेगा एक दिन काफल में रस
भरेंगी नदियाँ
कूदेगी ताल की माछी
छीड़ का पानी फोड़ेगा
डाँसी पत्थर

जै हो!
इस बखत की संध्या में
इस बखत की अमूसी रात की चाँख[2] लगी है
तेरह बरस का राज्य
तेरह बरस का बछड़ा
बिज्वार[3] नहीं बनेगा
कौन मलेगा रे उसकी उगती जुड़ी पर तिल का तेल

आहा
तेरह बरस का बछड़ा
गोठ का बछड़ा
दूध का बछड़ा
रमकनी धमकनी बिना गुरु की
बिना मन्त्र की
बिना तन्त्र की
कुर्सी की भेंट चढ़ गया रे
इस बखत के बीच में

तेरह बरस का गोठ का बछड़ा
क्रूर दैत्य की कैसी भेंट चढ़ा हाँ
गर्भ का अभिमन्यु
गर्भ का अजुवा बफौल[4]
गर्भ के गोरिल[5]
और गर्भ के गंगुवा के बाले[6]

सुनना रे सुनना
सुनना रे मेरी जात के रखवालो
सुनना रे मेरे पीठ के भाईयो
सुनना रे मेरी रकत की धार
सुनना रे मेरे भाई ग्वाले झकरुवा[7]

हाँ तेरह बरस का बछड़ा
गोठ का बछड़ा
गोठ ही मार दिया गया रे
हाय-हाय !
शिब-शिब !

उसकी खाल के पूड़े बने
आँत की डोरी बनी
राजनीति की बेतुकी ढोल मुड़ी
ढोल बजी, बेतुकी बजी
राजा का बाजा बेतुका ही होता है रे

आहा! पितरों की पूण्य भूमि में
कैसा नाच हुआ!
ताल से बेताल नाचे राजा
आण-बाण बयाल, आँचरी के बेताल रथ
हमारे घरों
हमारे ख़ामोश आँगनों से होकर गुज़रे

एहो शिब शिब हाय हाय
हमारी माएँ रोईं
हमारे भाई रोए
हम रो रहे हैं
अवतार को तरस रहे हैं
कहाँ जाएँगे रे हमारे आँसू

ए हो
मेरे धर्म्यादास[8]
मेरे रमोलिया
उदास बखत है ये
अगास देखना है इस बखत

किस तरह बाँट खाया होगा रे एक तिल का दाना सात बहनों ने[9]
कैसे काटा होगा विपदा का समय बता-बता
इस भारत में भारत[10] लगा रे
दे पमपुकिया थाप अपने हुडुक में!

पंचकोटि मेरे पुरखों का अगवानी है तू
ताल-बेताल नचाता है राजा-रजवाड़ों को
भूत-पिशाच को जलती धूनी में जलाने का हुनर दिखा रे

गाँव के गाँव नचा
नचा नया अपतार कर दे
घर के घर धिरका दे
गोठ की पाल से धूरी का भराना मिला दे
ए हो रमोलिया ऐसे बखत में
बजा रे अपना अर्जदासी ढोल

कि जिसके बजने से
गाड़ के मछेर अपनी लुवासुरी जाल निकाल लें
कि घसेर अपनी घुँघराली दराती पया के कमर खोस लें
लकड़िया अपनी कुल्हाड़ी
चिरानी अपनी लम्बे दाँतों वाली आरी
हलिया पहिन ले हाथों में ज्वारफार[11]
ल्वार उछल-उछल कर घन की चोट मारने लगे

बजे रणसिंगा, भौंकर बजे
पैपरबाजा[12] बजे
खानदानी खडग चमकने लगे रे
बड़ीयाठ की धार से रकत टपकने लगे रे
कि जिसके बजने से जगे अस्मिता मेरे मुलुक की

आहा रमोलिया
आज तुझे ब्रह्महत्या माफ
आज तुझे गुरुहत्या माफ
नौ नाथ, चौरासी सिद्दों का पाप नहीं
गौहत्या का पाप नहीं

रजस्वला स्त्री के ख़ून में डूब जा
विधवा स्त्री के आँसू साफ़ कर दे
जात का घोड़ा मार दे
नाल को माथे लगा दे
काली घोड़ी का सवार हो जा
आते बसन्त जाती पूस की बयार हो जा

घाट-घाट बाट-बाट में लुटते लौंड-लभारों का दगड़ीया बन जा रे
ऐसे उदास बखत में
उदासिया हूँ मैं भी

कहाँ जाऊँ किधर जाऊँ
हर रास्ता बन्द है
या कि हर रास्ता कर दिया गया है बन्द

काट रे जाल काट
पौ फाड़
पूरब की दिशा जगा
जगा रे सूरज के घोड़ियों को जगा
इस बखत के बीच !

शब्दार्थ
  1. लोक कथा कहने वाला
  2. नज़र
  3. बैल
  4. लोक कथा का एक मिथकीय पात्र (जिसे गर्भ में ही मार दिया गया)
  5. लोक कथा का एक मिथकीय पात्र
  6. लोक कथा का एक मिथकीय पात्र
  7. लोक कथा का एक मिथकीय पात्र
  8. लोक कथा का एक मिथकीय पात्र
  9. एक लोक कथा
  10. लोक कथा का प्रस्तुतिकरण
  11. चौड़े-चपटे मुँह वाली धारदार लोहे की फाल जो बंजर ज़मीन को जोतने में इस्तेमाल होती है
  12. बैगपाईपर