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रवाँ है मौज-ए-फ़ना जिस्म ओ जाँ उतार मुझे / ख़ालिद कर्रार

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रवाँ है मौज-ए-फ़ना जिस्म ओ जाँ उतार मुझे
उतार अब के सर-ए-आसमाँ उतार मुझे

मेरा वजूद समंदर के इजि़्तराब में है
के खुल रहा है तेरा बाद-बाँ उतार मुझे

बहुत अज़ीज़ हूँ ख़ारान-ए-ताज़ा-कार को मैं
बहुत उदास है दश्त-ए-जवाँ उतार मुझे

कोई जज़ीरा जहाँ हस्त ओ बूद हो न फ़ना
वजूद हो न ज़माना वहाँ उतार मुझे